Tuesday, January 26, 2016

 ता. ९ जुलाइ २००९
            मेरे खयालो में

 


            कुछ युहिं सुनते सुनते मेरे खयालो मे कुछ हलचल मच गई
            वाइ-फ़ाइ के जमाने मे हम ट्राफ़िक मे भटकते ते अटकते
            हमारे अन्दर के शोर को बहार के जोर से शब्दो मे लपटे
            आते हे यहां कुछ बताने कुछ जताने कि मे भी तो हुं
            कुछ जानता हुं, कुछ समजता हुं, इसी लिए नहि कहता हुं
            में तो वो हुं जो समज कर भी ना समज बना रहता हुं
            क्योकीं हम ना तो ये समजते हे कि क्या हो रहा हे
            ओर ना हमारे पास वो समजने कि फ़ुरसत हे
            हम तो न्युझ चेनल मे फ़िकशन ओर फ़िकशन चेनल पर रियालिटि
            को देखते हे ताली बजाते हे ओर खामोशी के नशे मे सो जाते हे.
         
        सुबह या तो आलाराम कि किरनोसे या मोबाइल कि रिंगटोन से उठते हे
        गुजरे हुए कल को साबुन शेम्पु से धो कर, नई परशानी के फ़्रेश कपडे
        पहन कर निकलते हे फ़िर ट्राफ़िक मे अटकने, खुद से भटकने
        दुसरो के दुख मे अपना शुख देखकर इतराते हूए
        दिन महिने साल काल युग कई जन्म निकल जाते हे
        हम ये नहि समज पाते हे कि हम यहां क्यों आते, क्यों जाते हे
        बार बार वहि करते हे बार वार वहि जीते हे वही मरते हे
        सिगरेट के धुंवो मे शराबो के घुंटो मे,
        माशूका के टेम्पररी प्यार मे किस्तो मे जीते हे लोनो मे मरते हे
        ना मे मायुस नहि हु नाहि मे परेशान हु,
        ना मे नेगेटीव हु ना मे पोसेटीव हु मे तो बस हुं
        सवके अन्दर कभी धडकनो मे थीरकन के रुप मे
        कभी आंसु की नमी के रुप मे, सफ़लता मे खुशी के रुप मे
        असफ़लता मे कोशीश के रुप मे, बस हु मे उन हर उम्मिदो मे
        जो कभी तो समजे गा, कभी तो जाने गा मे यंहा क्यो हूं.
भरत डी भट्ट