Tuesday, November 13, 2018

रे मन

रे मन....
24/09/2018
3:52am
जहांनुम भी कभी जन्नत थी,अमनो चमन था,
अमन को मन की नझर लग गई,
चमन मन छोड चला, अब मन सांसो से नहीं सिसकियों से चलता हैं, सियासत मैं पलता हैं।
एक मन एक वतन टुकड़ों मैं बंट गया
सियासत से सरहद, सरहद पर सियासत,
विरासते हिजरत कर गई,
बंदुके सांस लेती हे, बम दम छोडते हे,
इन्सानियत का दम घुटता नहीं, बम से मन भरता नहीं।
मन का हुआ तो क्या चंगा, मैली नही हुई क्या गंगा !
झेलम चींख चींख कर रोई रोक सको तो रोको कोई।
नफरतें बारिश सी बरशती है यहां,
आयते बर्फ सी जमती हैं यहां, श्लोकों मे मन का उवाच हैं- "वो हममे आ चुका हैं, जो करना हैं हमें ही करना हैं।
जब भी उनके मुंह से गोलियां चले, तू अपने हाथों से उसे रंग दे प्यार के रंगों से वो पिघला हैं पिघलेंगे।
वो जो मुझमे हैं वो तुझमें भी तो हैं।
© All right reserved.
Bharat D Bhatt.

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