vidushak
आज कल पल पल ये ख्याल आता है की चल पड़े थे जिस राह पर मंज़िल की तलाश में, ना थमे ना रुके बस चलते गए| मंज़िले मिली पर मुकमल ना थी | फिर चलना शुरू किया हर मोड़ पर कुछ नही कुछ पुराने मुशाफिर मिले कुछ अपने से कुछ तकरीबन अपने से हवा में उड़ते उस तिनके की तरह जो किसी का सहारा बन कर उसके साथ चलना चाहता था और चला भी पर पता नहीं राह में राह में समजोते की दूकान आई हम ना रुके अभिमान के चलते नहीं स्वाभिमान के चलते |
जब भी मन की सुनी अपने अंदर की सुनी राह मिली और मंज़िले भी, पर जबभी किसी और के सुनी तब लगा की इस रास्ते पर भी मंज़िल मिलेगी पर न मिली. गलतियों के अल्पविरामों से शिखना कभी नहीं भुला पर जब गलतिया करने के मौके काम होने लगे तो जरासा थम कर पूछे मूड के देखता रहा की कुछ छूट तो नहीं रहा? पर पता ना चला की हम चलते गए और वो हम जो हमारे थे वो ही कंही छूट गए.
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